
लोकमंगल, संस्कृति, धर्म और समाज के विविध आयामों पर केंद्रित त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘सुमंगलम् प्रभा’ के नवीन अंक का विशेष विमोचन गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। इस अवसर पर पत्रिका के संपादक साधक राजकुमार जी ने भारतीय जनजीवन, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक मूल्यों पर आधारित इस महत्वपूर्ण शोध पत्रिका की प्रति वरिष्ठ जनप्रतिनिधि एवं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन जी को भेंट की। उपस्थित विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा संस्कृति-जगत से जुड़े लोगों ने पत्रिका के उद्देश्य और उसके वैचारिक योगदान की सराहना की।
पत्रिका के संपादक साधक राजकुमार जी ने बताया कि ‘सुमंगलम् प्रभा’ केवल एक सामान्य पत्रिका नहीं, बल्कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा, लोकसंस्कृति और समकालीन सामाजिक विमर्श के बीच एक सेतु के रूप में कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि पत्रिका का उद्देश्य केवल लेख प्रकाशित करना नहीं, बल्कि समाज में बौद्धिक जागरण, नैतिक चेतना और सांस्कृतिक आत्मबोध को सुदृढ़ करना है। इसके माध्यम से ऐसे विषयों को प्रमुखता दी जाती है, जो समाज के वास्तविक सरोकारों से जुड़े हों और जिनका प्रत्यक्ष संबंध लोककल्याण से हो।
उन्होंने आगे कहा कि यह पत्रिका लोकमंगल, धर्म, संस्कृति, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना जैसे विषयों पर गहन शोध एवं विश्लेषणात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करती है। पत्रिका में प्रकाशित शोध-पत्र न केवल अकादमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि समाज को नई दिशा देने वाले विचारों को भी सामने लाते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें समसामयिक विषयों पर विद्वानों के विचार, पुस्तक समीक्षाएं तथा भारतीय परंपरा से जुड़े विविध विमर्शों को भी स्थान दिया जाता है।
श्री नितिन नवीन जी ने पत्रिका की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय समाज की वास्तविक शक्ति उसकी संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक चेतना में निहित है। यदि इन मूल्यों को शोध और चिंतन के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव है। उन्होंने कहा कि ‘सुमंगलम् प्रभा’ जैसी शोध पत्रिकाएं भारतीय बौद्धिक परंपरा को सशक्त करने का कार्य कर रही हैं और युवा शोधार्थियों तथा साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यह पत्रिका उसी दिशा में कार्य करती दिखाई देती है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता का समन्वय दिखाई देता है। समाज में नैतिक मूल्यों के संरक्षण, शिक्षा के संवर्धन तथा सांस्कृतिक जागरूकता के प्रसार के लिए ऐसे प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
कार्यक्रम में उपस्थित अन्य वक्ताओं ने भी पत्रिका के उद्देश्य और उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता की प्रशंसा की। वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में शोध के क्षेत्र में मौलिकता और भारतीय दृष्टि का अभाव दिखाई देता है, जबकि ‘सुमंगलम् प्रभा’ भारतीय चिंतन की जड़ों से जुड़कर शोध को नई दिशा देने का प्रयास कर रही है। यह पत्रिका समाज और अकादमिक जगत के बीच संवाद स्थापित करने का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है।
पत्रिका के नवीन अंक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सामाजिक परिवर्तन, भारतीय संस्कृति, शिक्षा, पर्यावरण और तकनीकी विकास जैसे समसामयिक विषयों को विशेष रूप से स्थान दिया गया है। संपादकीय मंडल के अनुसार, आधुनिक तकनीकी युग में भारतीय जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को संरक्षित रखते हुए विकास की नई संभावनाओं पर गंभीर विमर्श आवश्यक है। इसी उद्देश्य से पत्रिका में शोधपरक और तथ्याधारित सामग्री को प्राथमिकता दी जाती है।
ज्ञात हो कि ‘सुमंगलम् प्रभा’ एक पीयर-रिव्यूड (Peer Reviewed) एवं ओपन एक्सेस शोध पत्रिका है, जो नियमित रूप से विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक विषयों पर गुणवत्तापूर्ण शोध सामग्री प्रकाशित करती है। पत्रिका का उद्देश्य केवल अकादमिक शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में सकारात्मक चेतना का निर्माण करना भी है। इसके माध्यम से युवा शोधार्थियों, शिक्षकों, साहित्यकारों और सामाजिक चिंतकों को एक ऐसा मंच प्रदान किया जा रहा है, जहाँ वे अपने विचारों और शोध को व्यापक समाज तक पहुँचा सकें।
समारोह के अंत में अतिथियों का स्वागत एवं आभार व्यक्त करते हुए आयोजकों ने कहा कि भविष्य में भी ‘सुमंगलम् प्रभा’ समाजोपयोगी और ज्ञानवर्धक विषयों पर अपने प्रकाशन के माध्यम से लोकमंगल की भावना को आगे बढ़ाती रहेगी। कार्यक्रम का समापन भारतीय संस्कृति और सामाजिक समरसता के संदेश के साथ हुआ।